बीते कुछ दिनों में भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव भरी बयानबाज़ी ने नए संकेत दिए हैं।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा कि पाकिस्तान सर क्रीक इलाके में लगातार अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है, और अगर उसने किसी भी दुस्साहस की कोशिश की, तो भारत का जवाब ऐसा होगा कि “इतिहास और भूगोल दोनों बदल जाएंगे।”
रक्षा मंत्री के बयान के कुछ ही दिन बाद, सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने भी पाकिस्तान को सख्त चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि अगर पाकिस्तान ने आतंकवाद का समर्थन जारी रखा, तो भारत अगली बार वैसा संयम नहीं दिखाएगा जैसा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दिखाया गया था।
जनरल द्विवेदी ने अपने सैनिकों से “अगले संघर्ष के लिए तैयार रहने” की बात भी कही — यह अपने आप में बहुत कुछ कह देता है।
आमतौर पर भारत की ओर से इस तरह के आक्रामक बयान कम ही सुनने को मिलते हैं। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि शायद सरकार के पास पाकिस्तान की ओर से किसी नई साजिश की पुख्ता जानकारी है।
उधर, पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर ने हाल के महीनों में दो बार अमेरिका का दौरा किया, जहाँ उन्हें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से विशेष आतिथ्य मिला। लेकिन यही नहीं — अमेरिका की जमीन से ही मुनीर ने भारत के खिलाफ बयान देकर कूटनीतिक मर्यादाओं को तोड़ दिया।
उनके लौटने के कुछ दिन बाद पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ले. जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने कहा कि किसी भी भविष्य के सैन्य टकराव की शुरुआत पाकिस्तान भारत के पूर्वी हिस्से को निशाना बनाकर करेगा।
यह दावा चौंकाने वाला है — क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की मिसाइलें सिरसा और हिसार से आगे नहीं जा सकीं थीं, तो अब वे पूर्वोत्तर भारत तक कैसे पहुँचेंगी?
इसका उत्तर शायद बांग्लादेश की राजनीति में छिपा है।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस, जिन्हें अमेरिकी नीति-निर्माता “अपना करीबी” मानते हैं, हाल ही में ट्रंप से मिले और भारत पर परोक्ष हमले बोले।
यही संकेत देता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अमेरिका के बीच भारत-विरोधी समझ का कोई नया सूत्र तैयार हो रहा है।
अब सवाल यह है कि क्या अमेरिका पाकिस्तान को अपने हितों के लिए भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है?
या फिर पाकिस्तान अमेरिका और चीन — दोनों को साधकर अपने लिए नई जगह बनाने की कोशिश में है?
दरअसल, ट्रंप प्रशासन के हालिया बयान — खासकर अफगानिस्तान के बगराम एयरबेस को दोबारा हासिल करने की इच्छा — इस पूरे खेल को और दिलचस्प बनाते हैं।
अगर अमेरिका को अफगानिस्तान में फिर से सैन्य ठिकाना मिल जाता है, तो वह पाकिस्तान के ज़रिए भारत और चीन दोनों पर नज़र रख सकता है।
इसी कड़ी में मुनीर ने ट्रंप को पाकिस्तान के पासनी बंदरगाह के विकास का प्रस्ताव दिया है, जो चीन के ग्वादर पोर्ट से सिर्फ सौ किलोमीटर दूर है।
पाकिस्तान को उम्मीद है कि अमेरिका इस पेशकश के ज़रिए खुश होकर बलूच विद्रोहियों से दूरी बना लेगा — और बदले में पाकिस्तान को कूटनीतिक और आर्थिक राहत मिलेगी।
मुनीर की यह रणनीति एक साथ चीन और अमेरिका दोनों के साथ रिश्ते संतुलित रखने की कोशिश भी है।
मगर इस नई “दोहरी चाल” ने भारत के सामने चुनौती बढ़ा दी है।
क्योंकि अगर पाकिस्तान में अमेरिका और चीन दोनों का दखल बढ़ता है, तो भारत की सीधी कार्रवाई की गुंजाइश सीमित हो सकती है।
शायद इसी आत्मविश्वास के चलते पाकिस्तान अब सर क्रीक के पास अपनी फौजें बढ़ा रहा है और जामनगर की विशाल तेल रिफाइनरी तक पर हमला करने की धमकी दे रहा है।
हालाँकि, विश्लेषक मानते हैं कि इस धमकी की पटकथा पाकिस्तान में नहीं, बल्कि कहीं और — वॉशिंगटन में लिखी जा रही है।
कहा जा रहा है कि अमेरिका नहीं चाहता कि भारत की कंपनियाँ रूस से तेल खरीदें, और इसी दबाव की गूँज अब इस कूटनीतिक खींचतान में सुनाई दे रही है।
आख़िर में सवाल यह भी है कि चीन इस बदलते परिदृश्य को कैसे देखेगा —
क्या वह भारत के साथ सहयोग बढ़ाएगा या अमेरिका के साथ “जी-2” मॉडल यानी साझा वैश्विक वर्चस्व के रास्ते पर चलेगा?
एक बात निश्चित है — आने वाला समय दक्षिण एशिया के लिए आसान नहीं है।
पाकिस्तान से जुड़ा अगला टकराव न केवल सैन्य रूप से, बल्कि भू-राजनीतिक स्तर पर भी कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।







